त्रिबंध प्राणायाम कैसे करें | मूलबंध उड्डियान बंध जालंधर बंध के साथ

इस पोस्ट में हम सीखेंगे की त्रिबंध प्राणायाम क्या है और कैसे करें क्योंकि ये प्राणायाम हमारे मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है एवं इससे हमारे शरीर के एक नहीं बल्कि कई सारे रोग दूर हो जाते हैं।

त्रिबंध प्राणायाम क्या है?

त्रिबंध प्राणायाम तीन प्राणायामो को मिलाकर किया जाता है मूलबंध, उड्डियानबंध और जालंधर बंद। जब हम इन तीनों प्राणायामो को एक साथ लगाते हैं तो इसे ही त्रिबंध प्राणायाम कहा जाता है।

त्रिबंध प्राणायाम करने से हमारे शरीर की सभी नारियां शुद्ध हो जाती है इस अभ्यास को लगातार तीन महीने तक कर लेने से आपके सभी शारीरिक एवं मानसिक प्रॉब्लम को खत्म कर देती है एवं आपके शरीर में स्थिरता और मस्तिष्क में तीव्रता आने लगता है।

त्रिबंध प्राणायाम करने से पुरुषों एवं महिलाओं में यौन रोगों का सफाया हो जाता है एवं पाचन क्रिया मजबूत होती है।

त्रिबंध प्राणायाम करने से हमारी आंतों की सफाई अच्छी तरह से होती है और लीवर मजबूत होता है फिर कुछ भी खाया हुआ आसानी से पचता है और शरीर में लगता है। ये भी पढ़ें: 75 Crore Surya Namaskar Registration

त्रिबंध प्राणायाम कैसे करें?

त्रिबंध प्राणायाम कैसे करें
त्रिबंध प्राणायाम कैसे करें

किसी समतल जगह पर सिद्धासन में बैठ जाएं और फिर सबसे पहले मूलबंध फिर उड्यानबंध और फिर जालंधर बंद लगाएं और इस अवस्था में कम से कम 15 से 30 सेकंड तक रुके। (नीचे चित्र देखें)

त्रिबंध प्राणायाम
त्रिबंध-प्राणायाम

ऐसे करके आप शुरुआती में तीन बार और फिर 5 और फिर 7 और फिर 11 और 21 से लेकर 51 बार तक त्रिबंध लगा सकते हैं।

नोट: अगर आपको कोई गंभीर बीमारी है तो त्रिबंध प्राणायाम लगाने से पहले अपने योग शिक्षक या डॉक्टर से संपर्क जरुर करें।

मूलबंध क्या है?

मूल यानी गुदाद्वार को सिकोड़ के रखना या बंद करके रखना ही मूलबंध कहलाता है। गुदाद्वार यानी जहां से हम मल या शौच त्याग करते हैं।

सोच त्याग करते समय आखरी में जब हम अपने गुदाद्वार को सिकोड़ते हैं तो ऐसे ही मूलबंध भी लगाया जाता है।

सिद्धासन में बैठने के बाद गुदाद्वार यानी मल त्यागने वाली जगह को अंदर के तरफ सिकोड़ के या खींच के रखना होता है और शुरुआती में आप बहुत ज्यादा देर तक इसे सिकोड़ के नहीं रख पाते हैं लेकिन धीरे-धीरे अभ्यास करते करते फिर आप इस प्रक्रिया को काफी देर तक करने लग जाते हैं।

पुरुषों या महिलाओं में किसी भी तरह के यौन रोगों के लिए मूलबंध रामबाण इलाज होता है इसे आप शुरुआती में एक मिनट से शुरू करके 5 से 10 मिनट तक लगा सकते हैं।

मूलबंध में ही आप कपालभाति अनुलोम विलोम या भस्त्रिका प्राणायाम को भी कर सकते हैं या सुबह या शाम टहलते हुए भी मूलबंध लगा सकते हैं। ये भी पढ़ें: पेट में गैस की रामबांण दवा

उड्डियान बंध क्या है?

श्वास को बाहर छोड़ते हुए अपने नाभि के नीचे और ऊपरी भाग को पीछे के तरफ सिकोड़ के रखना ही उड्डियान बंध कहलाता है।

उदाहरण के लिए जब आप श्वास बाहर छोड़ते हैं तो पेट अपने आप अंदर जाता है लेकिन उड्डियान बंध में पेट को पूरी तरह से अंदर के तरफ सिकोड़ के पीठ में चिपका देना होता है। (नीचे चित्र देखें)

उड्डियान बंध
उड्डियान बंध

शुरुआती में पेट को अंदर के तरफ सिकोड़ पाना इतना आसान नहीं होता है लेकिन धीरे-धीरे इसका अभ्यास करते करते होने लगता है। ये भी पढ़ें: खुबकला क्या है

जालंधर बंध क्या है?

जालंधर बंध में हम अपने कंठ को सिकोड़ते हैं और फिर ठुड्डी को हृदय से लगा देते हैं और इसे ही जालंधर बंध कहा जाता है।

शुरुआती में कंठ को या गले को सिकोड़ पाना आसान नहीं होता है इसलिए धीरे-धीरे अभ्यास करके ये क्रिया होने लगती है।

जालंधर बंद करने के लिए आप अपने संपूर्ण श्वास को बाहर छोड़ दें और फिर कंठ को सिकोड़े और फिर सिर को नीचे करते हुए ठुड्डी को ह्रदय से स्पर्श करें और यही प्रक्रिया जालंधर बंध कहलाता है। (नीचे चित्र देखें)

जालंधर बंध
जालंधर बंध

त्रिबंध में तीनों प्राणायाम एक साथ करना

जैसे कि हमने ऊपर बताया कि त्रिबंध में मूलबंध, उड्यान बंध और जालंधर बंध इन तीनों प्रक्रिया को एक साथ किया जाता है और इसे ही त्रिबंध प्राणायाम कहते हैं।

यानी सबसे पहले आप सिद्धासन में बैठ जाएं और फिर मूलबंध में अपने गुदा या शौच के रास्ते को सीकोड़ें अब आपका मूलबंध लग चुका है अब मूलबंध में रहते हुए उड्यान बंध करें इसके लिए अपने नाभि या पेट को पीठ के तरफ खींचे।

अब आपने मूलबंध और उड्यानबंध दोनों को लगा लिया है अब इन दोनों बंध के साथ जालंधर बंध लगाने के लिए अपने कंठ को सीकोड़ें और ठुड्डी को हृदय से स्पर्श करें और इसी अवस्था को त्रिबंध कहा जाता है।

त्रिबंध में श्वांस को जितना देर हो सके बाहर रोककर रखें और फिर त्रिबंध को खोलते हुए स्वास वापस ले ले और फिर इस प्रक्रिया को 3 से 5 बार या 11 से 21 बार तक अभ्यास को करते हुए बढ़ाते जाएं।

शुरुआती में आप तीन बार से त्रिबंध को शुरू करें और फिर एक हफ्ता के अंदर 6 से 9 बार तक करें और ऐसे करके आप जितना ज्यादा से ज्यादा करेंगे उसने ज्यादा आपको फायदा मिलेगा।

शुरुआती में श्वास को 10 सेकंड तक रोके और फिर अभ्यास बढने पर 20 से 30 सेकंड तक का त्रिबंध आप लगा सकते हैं।

जितना देर तक आप स्वास को रोक सके उतना ही देर त्रिबंध के अवस्था में रहे फिर स्वास वापस लेते ही त्रिबंध को छोड़ दें और सामान्य अवस्था में आ जाएं और फिर दोबारा से करें। ये भी पढ़ें: अल्सरेटिव कोलाइटिस का आयुर्वेदिक इलाज

सिद्धासन में कैसे बैठे?

मलद्वार जहां से हम शौच करते हैं एवं मूत्र द्वार जहां से हम मूत्र त्याग करते हैं के बीच में चार अंगुल का दूरी होता है और इसी दूरी को योनिस्थान कहा जाता है।

सिद्धासन में बैठने के लिए हमें अपने बाएं पैर के एडी को योनिस्थान से लगा देना है, लगाने का मतलब की एड़ी के ऊपर ही योनीस्थान को रखकर बैठ जाना है ताकि योनिस्थान से एडी दब जाए। (नीचे चित्र देखें)

अब अपने दाहिने पैर को बाएं पैर के ऊपर इस तरीके से रखें ताकि आपके दाहिने पैर का एड़ी योनिस्थान से लग जाए यानी योनि स्थान पर एड़ी स्पर्श करें।

अब अपने दोनों हाथों को ध्यान मुद्रा या वायु मुद्रा में करके दोनों पैरों के घुटनों पर रखें और इसी अवस्था को सिद्धासन में बैठना कहा जाता है। (नीचे चित्र देखें)

सिद्धासन
सिद्धासन

सिद्धासन को सभी आसनों का श्रेष्ठ कहा जाता है इसलिए इस आसन में बैठकर हम त्रिबंध प्राणायाम की क्रिया किया करते हैं।

वैसे तो सभी आसनों का अपना अपना अलग महत्व है लेकिन सिद्धासन से हमें सिद्धियां जल्दी प्राप्त होती है इसलिए इस आसन का नाम सिद्धासन है।

नोट: ऊपर बताए गए सभी आसन एवं प्राणायाम को करने से पहले आप अपने अनुभवी वैद्य या डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

और अंत में

इस पोस्ट में हमने सीखा की त्रिबंध प्राणायाम क्या है और कैसे करें एवं साथ ही मूलबंध, उड्यानबंध और जालंधर बंध के बारे में जानकारी लिया एवं सिद्धासन में बैठने की विधि को विस्तार पूर्वक जाना।

त्रिबंध मैं बैठने की बहुत बड़ी महिमा है एवं इससे हमारे शारीरिक एवं मानसिक कमियां दूर होती है इसलिए इसका अभ्यास करना आज से ही शुरू करें।

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